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उस रात ट्रांसफर ने बदल दी सब कुछ

मैं हमेशा से “थोड़ा-बहुत वाला” इंसान रहा हूँ। फेस्टिवल में 100 रुपए की लॉटरी, कभी IPL के दौरान 20 रुपए की ऑनलाइन प्रेडिक्शन, कभी दोस्त के जोर देने पर कैसीनो साइट पर फ्री स्पिन — हर बार हारा हूँ। मैंने ये मान लिया था कि मेरा नाम ही ‘लूजर’ है। असल ज़िंदगी में भी। छोटा सा काम था, किराए का मकान, पिछले साल कार खराब हो गई थी और नई नहीं ले सके। पत्नी को कहना पड़ा कि “बोनस नहीं आया इस बार।”

झूठ। बोनस आया था। पर महीने के तीसरे हफ्ते ही खत्म हो गया।

एक बार मैंने बैंक स्टेटमेंट खोलकर देखा — हर जगह छोटे-छोटे पैसे निकलते रहे, और कोई एंट्री बड़ी नहीं आई। तब मन में एक बात आई। अगर मैं हारने का आदी हूँ, तो क्या होगा अगर बस एक बार जीत जाऊँ? जीत का स्वाद तो जानूँ कम से कम।

रात के तीन बजे थे। बारिश की बूँदें खिड़की पर हथौड़े मार रही थीं। मैंने पुराने मैसेज टटोले। एक नंबर मिला — किसी कैसीनो सर्विस का। खोला तो देखा बैनर पर लिखा था: वावदा भुगतान हस्तांतरण के तरीके। मुझे ठहाका लगा। भुगतान के तरीके? पहले जीत तो हो जाए, फिर सोचेंगे तरीके।

पर मैंने खाता बना लिया। नाम, पता, पैन नंबर — इस बार KYC पहले से अपलोड कर दी। नहीं तो पिछली बार फँस गया था। जमा किए सिर्फ 250 रुपए। इतने में तो पिज्जा भी नहीं आता अच्छा वाला। सोचा, नुकसान सिमित रहेगा।

पहली मशीन — फ्रूट स्लॉट। पुराना क्लासिक। 5 रुपए का दांव। पहली ही स्पिन में तीन केले आ गए। 60 रुपए जीते। दूसरी स्पिन में संतरे — 45 रुपए। मुझे यकीन नहीं हुआ। तीसरी स्पिन में खाली। चौथी में सात नंबर आया और 120 रुपए।

मेरा बैलेंस कुछ ही मिनटों में 475 रुपए हो गया।

“बस, अब और नहीं,” सोचा। पर हाथ नहीं रुक रहा था। ये वही हाथ थे जो कभी लॉटरी टिकट में तीन नंबर भी नहीं ला पाए थे। उस रात कुछ और ही हो रहा था।

मैंने जोखिम लिया। दांव बढ़ाकर 20 रुपए कर दिया। अब हारूँगा तो सब उड़ जाएगा। दो स्पिन में सब गया — 475 से 415, फिर 395। घबराहट हुई। पर अगली स्पिन में डायमंड आया और स्क्रीन पर जलवा बिखर गया। 1,100 रुपए।

मैं खड़ा हो गया। चारपाई पर बैठा-बैठा घुटने काँपने लगे।

अब पता था — ये कोई संयोग नहीं बचा था।

मैंने वावदा भुगतान हस्तांतरण के तरीके में जाकर देखा कि निकासी कैसे होती है। UPI, बैंक ट्रांसफर, यहाँ तक कि क्रिप्टो तक था। मैंने हैंडल करने का तरीका समझ लिया। पर पैसे निकालने से पहले सोचा, शायद एक और दौर। लालच? हाँ, थोड़ा सा। पर उससे ज़्यादा था — हार की आदी ज़िंदगी को एक धक्का देने का मौका।

मैंने 200 रुपए अलग रख लिए (निकालने के लिए) और 900 से खेलना शुरू किया। दांव 10 रुपए। रूलेट टेबल खोली। लाल पर लगाया। काला आया। 890 रहे। फिर लाल — फिर काला। 870 रहे।

“बस,” मैंने कहा। “अब इतना ही काफी है।”

मैंने 870 रुपए का विड्रॉल किया और 200 का भी। कुल 1,070 रुपए। ट्रांजेक्शन शुरू हुई। उसी वावदा भुगतान हस्तांतरण के तरीके ने मेरे बैंक में पैसा भेजा। पाँच मिनट में आ गया। आँखों से देखा — सही में आया।

मैंने पत्नी को जगा दिया। उसने सोचा भूचाल आ गया।

“देख,” मैंने फोन दिखाया। “जीत गया। दस सौ रुपए।”

उसने नींद में मुझे घूरा, फिर मुस्कुराई। “तूने वो झूठ बोला था न बोनस वाला?”

“हाँ,” मैंने कहा। “पर अब सच है। ये बोनस नहीं, पहली जीत है।”

अगले दिन उसी पैसे से हमने ढेर सारे समोसे और जलेबियाँ मँगवाईं। बच्चे खुश थे। मैं बाथरूम में गया, शीशे में देखा — “तू लूजर नहीं है, तू बस इंतज़ार में था,” मैंने खुद से कहा।

उसके बाद मैंने कोई दूसरा बड़ा दांव नहीं लगाया। पर एक बात बदल गई — मैंने वावदा भुगतान हस्तांतरण के तरीके को अपने नोट्स में सेव कर लिया। जरूरत से नहीं, एहसास के लिए। कि जीत होती है, भरोसे की तरह। कि कभी-कभी 250 रुपए इतिहास बदल सकते हैं।

आज भी जब कोई कहे “जुआ बुरी चीज़ है,” मैं कहता हूँ — “बुराई लालच है, बहादुरी है रुकना जानना।” और मैं उस रात रुक गया। वरना किस्सा अलग होता।

लेकिन ये किस्सा मेरा है — एक सामान्य आदमी का, जिसने पहली बार अपने बैंक अकाउंट में ट्रांसफर देखकर महसूस किया कि उम्मीद भी एक करेंसी है, और मैं उस दिन अमीर था।